18 साल बाद इंसाफः छत्तीसगढ़ की बहुचर्चित ‘नकलची टॉपर’ पोरा बाई को 5 साल की जेल
अपर सत्र न्यायालय ने पलटा निचली अदालत का फैसला, केंद्राध्यक्ष और प्राचार्य सहित 4 दोषी

डेस्क | चांपा/रायपुर। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल (CGBSE) से जुड़े 18 साल पुराने चर्चित ‘पोरा बाई नकल कांड’ में आखिरकार न्यायालय का बड़ा फैसला सामने आया है। द्वितीय अपर सत्र न्यायालय ने 2008 की 12वीं बोर्ड परीक्षा की प्रदेश टॉपर रही पोरा बाई सहित चार आरोपियों को दोषी करार देते हुए 5-5 वर्ष के कठोर कारावास और 20-20 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई है।
दोषी ठहराए गए अन्य लोगों में तत्कालीन केंद्राध्यक्ष
फूलसाय नृसिंह, प्राचार्य एस.एल. जाटव और दीपक जाटव शामिल हैं। अदालत ने यह फैसला शासन की अपील पर सुनवाई करते हुए सुनाया और 2021 में आए निचली अदालत के बरी करने वाले निर्णय को पलट दिया।
कोर्ट की तल्ख टिप्पणी
फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा—“आरोपियों ने केवल शिक्षा मंडल के साथ ही नहीं, बल्कि उन लाखों मेहनती छात्रों के भविष्य के साथ भी अपराध किया है, जो दिन-रात कड़ी मेहनत करते हैं।”
क्या था पूरा मामला?
वर्ष 2008 में जांजगीर-चांपा जिले के शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय बिर्रा की छात्रा पोरा बाई ने 12वीं बोर्ड परीक्षा की प्रावीण्य सूची (मेरिट लिस्ट) में पहला स्थान प्राप्त किया था। लेकिन परिणाम घोषित होने के बाद उसकी उत्तरपुस्तिकाओं की लिखावट (हैंडराइटिंग) में अंतर और दस्तावेजों में विसंगतियां सामने आईं। जांच में खुलासा हुआ कि पोरा बाई की जगह किसी अन्य व्यक्ति ने परीक्षा दी थी और यह पूरा मामला संगठित रूप से किया गया फर्जीवाड़ा था।
केस की टाइमलाइन: 18 साल का सफर
2008: माध्यमिक शिक्षा मंडल की जांच रिपोर्ट के आधार पर 9 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज।
2021: 12 साल चली सुनवाई के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट चांपा की अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में सभी 9 आरोपियों को बरी कर दिया।
2026: शासन की अपील पर द्वितीय अपर सत्र न्यायालय ने निचली अदालत का फैसला पलटते हुए मुख्य आरोपियों को दोषी ठहराया।
कानूनी धाराएं
अदालत ने दोषियों को भारतीय दंड संहिता की निम्न धाराओं के तहत सजा सुनाई—
धारा 420 – धोखाधड़ी
धारा 467, 468 – कूटरचना
धारा 120-B – आपराधिक षड्यंत्र
मामले के अन्य 5 आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में दोषमुक्त कर दिया गया।
यह फैसला शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप माना जा रहा है।
