
बिलासपुर। पाटलिपुत्र समिति एवम छठ घाट समिति के द्वारा आयोजित छट पूजा में हजारो की संख्या में श्रद्धालुओं ने रविवार को डूबते सूरज को अर्ध दिया वही सोमवार को उगते सूरज को अर्ध दे कर अपने उपवास की समाप्ति की ।
जानकारों के अनुसार एसईसीएल,एनटीपीसी और रेलवे में अधिकांश कर्मचारी यूपी और बिहार के लोग कार्यरत है । जिनमे कई लोग अब यहाँ स्थाई तौर पर अब बस चुके है। जिन लोगों ने बिलासपुर में छठ पर्व को सार्वजनिक तौर पर मनाने की शहर में शुरुआत की। जिसमे पाटलिपुत्र समिति का बहुत बड़ा योगदान रहा। जिन्होंने भोजपुरी समाज को एकत्र कर छठ घाट में छठ पर्व मानने की शुरुआत की और छठ घाट का कायाकल्प कर छठ घाट को भव्य स्वरूप दिया। आज बिलासपुर का छठ घाट को एशिया का सबसे बड़ा छठ घाट माना जाता है। जहाँ लाखो की संख्या में श्रद्धालु एक साथ एकत्र होकर सूरज को अर्ध्य देते है।

हर साल की तरह इस साल भी पाटलिपुत्र समिति, छठ घाट समिति, पुलिस प्रशासन एवं नगर निगम द्वारा छठ घाट में छट पूजा को लेकर बेहतर इंतजाम किया गया था। इस पूजा को लेकर जिला प्रशासन एवम समिति के द्वारा शानदार व्यवस्था बनाई गई थी। छट घाट की ओर आने वाली सभी भारी वाहनों को परिवर्तित किया गया था, चारो और पुलिस की चाक चौकस व्यवस्था बनाई गई थी, सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाए गए थे, घाट की सुंदर साफ सफाई की गई थी, सुरक्षा के लिए पूरे समय एनडीआरएफ की टीम घाट में मौजूद रहे। चारो ओर पर्याप्त लाइटिंग की व्यवस्था थी,श्रद्धालुओं के लिए भोजन,पेयजल एवं पार्किंग की व्यवस्था आदि की विशेष व्यवस्था की गई थी।

इस पूरी व्यवस्था को लेकर पाटलिपुत्र समिति एवम छठ पूजा समिति के एच पीएच चौहान, एसपी सिंह, डॉ. ब्रजेश सिंह, व्ही, एन झा, आरपी सिंह, कमलेश चौधरी, एस के सिंह, लवकुमार ओझा, प्रवीण झा, बिनोद सिंह, धर्मेन्द्र कुमार दस, अभय नारायण राय, जे एन सिंह, राकेश दीक्षित, गोपाल सिंह, बी आर मिश्रा, संजय सिंह रजपूत, सुधीर झा, अशोक झा, विजय ओझा, डॉ. कुमुदरं जन सिंह, दिलीप चौधी, सीएम सिंह, धनंजय झा, बी एन ओझा, बीबी तिवारी, अर्जुन सिंह, मुन्ना सिंह, हरिओम दुबे,पंकज सिंह, मुकेश झा, प्रशांत सिंह, राघव झा आदि लगातार सक्रिय नजर आए।
•छठपर्व का महत्व•
वैसे तो छठपूजा को पूरे देश के लोग मानते है लेकिन उत्तर प्रदेश और खासकर बिहार में छठ का विशेष महत्व है। छठ सिर्फ एक पर्व नहीं है, बल्कि महापर्व है, जो पूरे चार दिन तक चलता है। नहाए-खाए से इसकी शुरुआत होती है, जो डूबते और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देकर समाप्त होती है।
•वर्ष में 2 बार मनाया जाता है छठ पर्व•
ये पर्व साल में दो बार मनाया जाता है। पहली बार चैत्र में और दूसरी बार कार्तिक में मनाया जाता है। चैत्र शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले छठ पर्व को ‘चैती छठ’ और कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी पर मनाए जाने वाले पर्व को ‘कार्तिकी छठ’ कहा जाता है। पारिवारिक सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए ये पर्व मनाया जाता है। इसका एक अलग ऐतिहासिक महत्व भी है।
•माता सीता ने भी की थी सूर्यदेव की पूजा•
छठ पूजा की परंपरा कैसे शुरू हुई, इस संदर्भ में कई कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, जब राम-सीता 14 साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, तब रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया। मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगाजल छिड़ककर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। इससे सीता ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी। सप्तमी को सूर्योदय के समय फिर से अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।
•महाभारत काल से हुई थी छठ पर्व की शुरुआत•
हिंदू मान्यता के मुताबिक, कथा प्रचलित है कि छठ पर्व की शुरुआत महाभारत काल से हुई थी। इस पर्व को सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण ने सूर्य की पूजा करके शुरू किया था। कहा जाता है कि कर्ण भगवान सूर्य के परम भक्त थे और वो रोज घंटों तक पानी में खड़े होकर उन्हें अर्घ्य देते थे। सूर्य की कृपा से ही वह महान योद्धा बने। आज भी छठ में अर्घ्य दान की यही परंपरा प्रचलित है।
•द्रोपदी ने भी रखा था छठ व्रत•
छठ पर्व के बारे में एक कथा और भी है। इस किवदंती के मुताबिक, जब पांडव सारा राजपाठ जुए में हार गए, तब द्रोपदी ने छठ व्रत रखा था। इस व्रत से उनकी मनोकामना पूरी हुई थी और पांडवों को सब कुछ वापस मिल गया। लोक परंपरा के अनुसार, सूर्य देव और छठी मईया का संबंध भाई-बहन का है। इसलिए छठ के मौके पर सूर्य की आराधना फलदायी मानी गई।
•पति और संतान प्राप्ति के लिए विशेष पर्व•
छठव्रती छठपर्व के कड़े नियमों का पालन करते हुए निर्जला व्रत रखती है छठपर्व में छठव्रती पति और संतान प्राप्ति के लिए निर्जला उपवास रखती है। पांचवे दिन उगते सूरज को अर्ध्य देकर छठव्रती व्रत तोड़ती है।