
बिलासपुर। सनातन जागृति अभियान के तहत संगीतमय दिव्य शिव महापुराण स्वामी नंदाचार्य जी महाराज के द्वारा किया जा रहा है।
खमतराई रोड स्थित कथा स्थल में शुक्रवार की शाम कथा करते हुए महाराज जी ने कहा कि सभी को पूजा अपने हिसाब से ही करना चाहिए। जब तक मन में पूजा के लिए भाव उत्पन्न न हो पूजा में नहीं बैठना चाहिए।

हम अपने जीवन के महत्वपूर्ण समय इधर उधर में गवां देते है और उम्र के अंतिम पड़ाव में आ कर पूजा पाठ करने की सोचते है। जिस उम्र में हमारे शरीर को आराम की जरूरत हो उस उम्र में आप पूजा में कैसे बैठ पाएंगे। हमको अपने युवा अवस्था में ही कुछ समय अपने इष्ट देव के आराधना के लिए निकालनी चाहिए। तभी हम सनातनी हो पाएंगे।

उन्होंने कहा बच्चे को जो भी पढ़ना है उसे पढ़ने दे इसमें कोई गलत बात नहीं है लेकिन उन्हें एक संस्कारवान जरूर बनाइए। ईश्वर की आराधना और बड़ो का सम्मान करना जरूर सिखाइए। इससे बच्चे कभी भी गलत रास्ते पर नहीं जाएगा। जीवन भर संस्कारवान बना रहेगा।

आज बच्चे देर रात तक पढ़ाई करते है या मोबाइल चलाते है और सुबह देर से उठते है। जिससे माता पिता से उनकी दो दो तीन तीन दिनो तक मुलाकात नहीं हो पा रही है, एक दूसरे को देख नहीं पाते। एक ही घर में रहकर अंजान बने रहते है, यह ठीक नहीं है। इसे ठीक करने की जरूरत है । बच्चे सुबह भोर में उठकर पढ़ाई करे समय में सो जाए। स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा होगा और पढ़ाई के लिए भी अच्छा होगा। आज लोग मंदिर तो बनवा दे रहे है लेकिन परिवार का कोई एक सदस्य उस मंदिर में पूजा करने जाने वाला नहीं है,मंदिर को पंडित के भरोसे छोड़ दिया है। ऐसा करने से क्या होगा। सनातनी का अर्थ यही है कि हम सनातनी बनकर जिए। आज लोग माथे पर चंदन लगाने में भी शर्म करते है,घर से बाहर निकलते ही उसे मिटा देते है। हम कैसे सनातनी है जो अपने धर्म से ही शर्म कर रहे है?