मुंगेली: डीईओ के ‘कागजी शेर’ पर भारी पड़ी कन्या शाला के प्राचार्य की ‘दिव्य दृष्टि’, सुशासन का ढोल फटा!
प्रथम अपीलीय अधिकारी के ‘कड़े आदेश’ को प्राचार्य महोदय ने दिखाया ठेंगा; सरकारी खजाने से सैलरी पाने वाले व्याख्याता की फाइलों में बंद है कौन सा ‘पवित्र रहस्य’?

मुंगेली। कहते हैं कि सरकारी तंत्र में आदेश ऊपर से नीचे की तरफ बहता है, लेकिन मुंगेली जिले के शिक्षा विभाग में गंगा उल्टी बह रही है। यहाँ शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय के जन सूचना अधिकारी (प्राचार्य) ने साबित कर दिया है कि ‘आदेश’ चाहे कितना भी बड़ा हो, अगर मन न हो, तो उसे हवा में कैसे उड़ाया जाता है। एक तरफ जहाँ मुंगेली कलेक्टर जिले में सुशासन और पारदर्शिता का चश्मा पहनकरनिरीक्षणों की ‘सर्जिकल स्ट्राइ सख्त नजर आ रहे हैं, वहीं उनके मातहत नियमों की ऐसी धज्जियां उड़ा रहे हैं कि देखने वाले भी दांतों तले उंगली दबा लें। कलेक्टर साहब के सुशासन का रडार शायद कन्या शाला की इस ‘अभेद्य दीवार’ को पार नहीं कर पा रहा है।
पूरा जिला हैरान है कि आखिर जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) के उस आदेश का क्या हुआ, जिसमें उन्होंने पूरे रौब के साथ कहा था,10दिवस के भीतर दस्तावेज आवेदक को दें।” शायद प्राचार्य के कैलेंडर में ’10 दिन’ का मतलब ‘ या ‘अगला जन्म’ होता है, तभी तो 15 दिन से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी वे आदेश की प्रति पर ध्यान लगाने बैठे हैं।
क्या है पूरा मामला का अनोखा मोह मामला बड़ा ही जनहितैषी है। श्री चंद्र कुमार महिलांग व्याख्याता (एल.बी.) के प्रथम नियुक्ति आदेश, शैक्षणिक योग्यता जैसी मामूली चीजों की सत्यापित कॉपियां मांग लीं। अब जनता के टैक्स से हर महीने मोटी सैलरी पाने वाले सरकारी सेवक के दस्तावेज भला ‘सार्वजनिक’ कैसे हो सकते हैं?
शुरुआत में तो प्राचार्य ने इस पर “निजता का हनन” का बोर्ड टांग दिया। कार्यालय जिला शिक्षा अधिकारी, मुंगेली द्वारा जारी आदेश क्रमांक / 2455 / सू.का.अधि. / 2026 दिनांक 30/04/2026 के तहत प्रथम अपीलीय अधिकारी ने साफ शब्दों में निर्देशित किया था कि आवेदक को 10 दिवस के भीतर वांछित दस्तावेज निःशुल्क उपलब्ध कराए जाएं।
आदेश के बाद शुरू हुआ ‘थर्ड पार्टी’ का नया धारावाहिक
नियम-कानून के सीधे रास्ते पर चलना शायद इस दफ्तर की तासीर में नहीं है। इसलिए डीईओ के आदेश के ठीक पांच दिन बाद, यानी 05/05/2026 को प्राचार्य ने एक नया पैंतरा निकाला। उन्होंने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 11 (थर्ड पार्टी) का ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया। साथ में संबंधित शिक्षक का एक आपत्ति पत्र भी नत्थी कर दिया, मानो दस्तावेज सार्वजनिक होते ही कोई बहुत बड़ा संकट आ जाएगा।
अब मुंगेली के चौराहों पर यह यक्ष प्रश्न तैर रहा है कि जो दस्तावेज नौकरी पाते समय सरकारी फाइलों में दर्ज हुए थे, वे अचानक इतने ‘रहस्यमयी’ कैसे हो गए? क्या इन दस्तावेजों को छूने से करंट लगेगा आवेदक और जागरूक नागरिकों का आरोप है कि दाल में काला नहीं बल्कि…..”। जिसे उजागर होने से बचाने के लिए पूरा दफ्तर एड़ी-चोटी का जोर लगा रहा है?
अब ‘जांच’ और ‘एक्शन’ के क्लाइमेक्स का इंतजार
वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों को ठेंगा दिखाने का यह अद्भुत हुनर अब मुंगेली कलेक्टर और बिलासपुर संयुक्त संचालक (JD) शिक्षा के दरबार में भी कौतूहल का विषय बनने जा रहा है प्राचार्य की इस ‘कथा’ को राज्य सूचना आयोग, रायपुर तक लेकर जाएंगे।
क्या मुंगेली कलेक्टर साहब इस मामले पर संज्ञान लेकर अपनी प्रशासनिक हंटर चलाएंगे..?
अब देखना यह है कि नियमों को ताक पर रखकर बैठे इस जन सूचना अधिकारी पर उच्च अधिकारी कब और कौन सी ‘प्रशासनिक घुट्टी’ चलाते हैं, या फिर संदेह की इस चादर को इसी तरह ढका रहने देकर ‘सुशासन’ का ढोल पीटा जाता रहेगा।