झोलाछाप डॉक्टरों पर कार्रवाई से आखिर क्यों बच रहा स्वास्थ्य विभाग?
बिलासपुर जिले में गली-गली खुली अवैध क्लीनिक, बिना डिग्री इलाज करने वालों पर कार्रवाई को लेकर उठे गंभीर सवाल

बिलासपुर। प्रदेश में झोलाछाप डॉक्टरों को लेकर स्वास्थ्य विभाग के दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। एक ओर स्वास्थ्य मंत्री का कहना है कि प्रदेश में झोलाछाप डॉक्टर नहीं हैं, वहीं दूसरी ओर बिलासपुर जिले के कई इलाकों में बिना मान्यता प्राप्त चिकित्सा डिग्री के कथित रूप से इलाज करने वालों की क्लीनिक संचालित होने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई स्थानों पर कथित झोलाछाप डॉक्टर खुलेआम क्लीनिक चला रहे हैं। ये लोग मरीजों को इलाज और दवाइयां देने का काम कर रहे हैं, जबकि उनके पास चिकित्सा कार्य करने की वैध योग्यता और पंजीयन है या नहीं, यह जांच का विषय है। सबसे चिंता की बात यह है कि ऐसे लोगों के पास इलाज कराने पहुंचने वाले गरीब और ग्रामीण तबके के लोग होते हैं, जिनकी जिंदगी के साथ किसी भी तरह का जोखिम गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
शिकायत के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं?
हाल ही में जिले में कथित झोलाछाप डॉक्टरों की सूची के साथ कलेक्टर से शिकायत किए जाने की बात सामने आई थी। शिकायत को कलेक्टर द्वारा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) को भेजकर आवश्यक कार्रवाई और जवाब देने के निर्देश दिए गए थे।
लेकिन शिकायत के करीब एक माह बाद भी ठोस कार्रवाई सामने नहीं आने से स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ता को कथित तौर पर यह जवाब दिया गया कि संबंधित लोगों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं और कार्रवाई जारी है।
अब सवाल यह है कि यदि कार्रवाई के निर्देश जारी किए गए थे तो पिछले 30 दिनों में उन निर्देशों का परिणाम क्या रहा? कितने कथित अवैध क्लीनिकों की जांच हुई? कितने लोगों से उनकी डिग्री, पंजीयन और क्लीनिक संचालन की वैधता से संबंधित दस्तावेज मांगे गए? और यदि कोई व्यक्ति बिना वैध योग्यता के चिकित्सा कार्य करता पाया गया तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई?
सिर्फ आदेश जारी करना ही कार्रवाई है?
स्वास्थ्य विभाग की कथित कार्रवाई को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या केवल निर्देश जारी कर देना ही पर्याप्त है? यदि जिले में वास्तव में बिना वैध योग्यता के चिकित्सा कार्य करने वाले लोग सक्रिय हैं, तो उनकी पहचान कर जांच और नियमानुसार कार्रवाई करना विभाग की जिम्मेदारी है।
वहीं, यदि शिकायत में लगाए गए आरोप गलत हैं तो स्वास्थ्य विभाग को जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए, ताकि आम जनता के बीच भ्रम की स्थिति न रहे।
विभाग की कार्यप्रणाली पर उठ रहे सवाल
बिलासपुर जिले में कथित झोलाछाप डॉक्टरों की बढ़ती संख्या और शिकायतों के बावजूद कार्रवाई में देरी को लेकर अब कई सवाल उठने लगे हैं। आखिर स्वास्थ्य विभाग की निगरानी व्यवस्था इतनी कमजोर क्यों है? क्या विभाग को इन कथित अवैध क्लीनिकों की जानकारी नहीं है? यदि जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? और यदि जानकारी नहीं है तो नियमित निरीक्षण और निगरानी व्यवस्था किस तरह संचालित हो रही है?
सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या किसी शिकायत पर कार्रवाई के नाम पर केवल कागजी आदेश जारी कर मामला खत्म किया जा रहा है, या वास्तव में जमीन पर जांच और कार्रवाई भी हो रही है?
अब जरूरत है कि स्वास्थ्य विभाग पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर जिले में संचालित संदिग्ध क्लीनिकों की जांच करे और जो भी व्यक्ति बिना वैध डिग्री, पंजीयन या अनुमति के चिकित्सा कार्य करते पाया जाए, उसके खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
क्योंकि मामला सिर्फ नियम-कायदों का नहीं, बल्कि आम लोगों की जिंदगी और स्वास्थ्य से जुड़ा है।