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अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है’ छत्तीसगढ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी’: लेखक – लोकेश शरण

बिलासपुर/रायपुर। वास्तव में अपनी शोध सामग्रियों अथवा संदर्भ स्रोतों की तलाश के क्रम में मुझे “छत्तीसगढ़ राज्य हिंदी ग्रंथ अकादमी” जाने का अवसर मिला। जिसे देख कर लगा रहा है कि वह अपनी बदहाली पर आज आंसू बहा रहा है।

पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के परिसर में सामुदायिक भवन के सामने स्थापित छत्तीसगढ का इकलौता ‘छत्तीसगढ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी‘ का भवन व इसका परिसर समुचित संरक्षण के अभाव में ‘भूतबंगले’ में तब्दील होता नजर आता है। अपने रचनात्मक क्रियाकलापों से ख्याति अर्जित करने वाले इस ग्रंथ अकादमी से पिछले लगभग छः वषों  में एक भी पुस्तक का प्रकाशन नहीं हो सका है। प्रकाशन कार्य ठप है। परिणामस्वरूप छत्तीसगढ के बुद्धिजीवियों,  इतिहासविदों व विशेषकर शोधार्थियों को अपूरणीय क्षति हो रही है। ग्रंथ अकादमी के दैनिकभोगी कर्मचारी वर्षो से फांकाकसी का जीवन गुजार रहे हैं। जबसे प्रकाशन कार्य ठप हुआ है, तभी से अकादमी के दुर्दिन की शुरुआत भी हो गई। 

यहां कार्यरत बेचारे कर्मचारी मेरे सवालों से चौक गये और जानकारी देने से कतराने लगे। यह अनुमान लगाते मुझे देर नहीं लगी कि उनमें अनिष्ट की आशंका घर कर गई कि कहीं मीडिया में बात आ गई तो उसका खामियाजा उन्हें न भुगतना पड़े ! तभी इन सबों से और कुछ पूछना मुनासिब नहीं लगा।

स्मृतिस्वरुप परिसर के कई फोटोग्राफ्स लिए। अपनी पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में कालापानी की ऐतिहासिक भूमिका‘ की एक प्रति ग्रंथ अकादमी को उपहार में दिया। अकादमी के संबंध में अन्य स्रोतों से जानकारी एकत्र किया।

दरअसल मैं अपनी आगामी पुस्तक के लिए संदर्भ ग्रंथों की तलाश में भटक रहा था। पता चला कि ‘छत्तीसगढ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी,रायपुर’ शोध ग्रंथों के प्रकाशन में अव्वल है। मैने रायपुर के अपने मित्रों से संपर्क साधा और उन्हें मनचाही पुस्तकों की सूची भेजी। उनमें से कुछ ही उपलब्ध हो सकी। तभी मेरे मन में ग्रंथ अकादमी में स्वयं जाकर पुस्तकों की तलाश करने की इच्छा जगी।  मुझे बिलासपुर से राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली जाना था। दिल्ली से लौटकर मैं रायपुर पहुंचा। रायपुर में कुछ दिन रहकर अध्ययन में लगना था। कुछ ग्रंथालयों के साथ-साथ राज्य अभिलेखागार से भी संपर्क करना था। इसी दौरान मुझे ‘छत्तीसगढ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी’ का दर्शन करने का अवसर मिला, परन्तु  वहां के हालात देखकर मन द्रवित हो उठा। अपने समय का ख्यातिप्राप्त यह संस्थान अपनी बदहाली का दंश झेल रहा है। वहां पदस्थ कर्मचारियों ने सूचीपत्र के अनुसार वांछित पुस्तकों को तलाशा, परन्तु वे पुस्तकें स्टाक में नहीं होने की जानकारी दी गई।  लगभग 136 शीर्षकों से प्रकाशित 16-17 लाख मूल्य की पुस्तकें पड़ी हुई हैं। दर्जनों शोध ग्रंथों का पुनर्मुद्रण नहीं हो पाया है। कुछ पुस्तकें मैंने उपहार में देने के उद्देश्य से क्रय किया और बड़े बोझिल मन से वहां से लौट आया।

रायपुर से बिलासपुर लौटकर मैं अपनी पढ़ाई में लग गया। पढ़ाई लिखाई से फुर्सत पाया तो ग्रंथ अकादमी का जंगल झाड़ वाला दृष्य मानसपटल पर बार-बार कौंधने लगा। कई दिन तो यही सोंचने में गुजर गए कि फेसबुक पर स्टोरी लिखूं या नहीं ? यह भी विचार आया कि क्या फायदा लिखने का, जब ग्रंथ अकादमी की समस्या सरकार तक पहुंचेगी ही नहीं ! कई तरह के विचार मंथन के बाद आज कुछ लिखने को बाध्य हो गया। भले ही इसका परिणाम ‘शुन्य’ निकले, परन्तु एक तरह के अपराध बोध से तो मुक्त हो जाऊंगा !

आप सबों को ‘छत्तीसगढ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी’ के संक्षिप्त इतिहास को भी जानना यहां प्रासंगिक प्रतीत होता है।आधिकारिक जानकारी के मुताबिक वर्ष 1968 में केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अंतर्गत भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा के छात्रों के लिए विभिन्न विषयों की पस्तकों के लेखन, प्रकाशन के साथ-साथ उनका विक्रय किए जाने की योजना बनाई थी। इस परिपेक्ष में हिन्दी प्रदेशों में ग्रंथ अकादमियों का गठन किया गया। इसके अन्य उद्देश्यों में हिन्दी भाषा का प्रचार-प्रसार करने, हिन्दी के पाठ्यपुस्तकों की उपयोगिता को बढ़ाने, विद्वानों, शिक्षकों, छात्रों व पाठकों के बीच सेतु के रूप में कार्य करने के अलावे शोधार्थियों को मानक पुस्तकें व संदर्भ ग्रंथ उपलब्ध कराने, लेखकों को नियमानुसार राॅयल्टी उपलब्ध कराने, न्यूनतम मूल्यों पर गुणवत्तापूर्ण पुस्तकें उपलब्ध कराने आदि के व्यापक उद्देश्यों को लेकर हिन्दी ग्रंथ अकादमी की स्थापना कराई गई थी।

वर्ष-1970 में स्वायत्तशासी संस्था के रूप में ‘मध्य प्रदेश हिन्दी ग्रंथ  अकादमी’ की स्थापना भोपाल में की गई। 1 नवंबर, 2000 में मध्य प्रदेश को विभाजित कर छत्तीसगढ राज्य का गठन किया गया। जनवरी, 2006 में ‘छत्तीसगढ राज्य हिन्दी ग्रंथ अकादमी‘ की विधिवत स्थापना की गई और 6 जून, 2006 को इसे पूर्ण मान्यता मिली। इसके पदेन अध्यक्ष, राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री व पदेन उपाध्यक्ष स्कूली शिक्षा मंत्री होते है। अकादमी के संपूर्ण गतिविधियों का संचालन एक ‘संचालक’ के अधीन होता है। इस अकादमी का कोई स्थाई संचालक नहीं है। वषोँ से यह पद ‘प्रभार’ में चल रहा है।

इस पोस्ट के साथ संलग्न तस्वीरों का अवलोकन कर आप सभी पाठकगण अनुमान लगा सकते हैं कि कौन से माननीय पदधारक अपनी कौन सी भूमिका निभा रहे है ? मुझे आशा ही नहीं अपितु पूर्ण विश्वास है कि हिन्दी ग्रंथ अकादमी को पुर्नजीवित करने की दिशा में राज्य सरकार व उनके आलाधिकारी आगे आयेंगे और अकादमी का प्रांगण एकबार पुनः गुलजार हो सकेगा। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ राज्य अपनी स्थापना की 24वीं वर्षगांठ पूर्णहर्षोल्लास के साथ धूमधाम से मना रहा है। एक कल्पना यह भी है कि राज्य सरकार तक इस पोस्ट को पहुंचाने में भी आप सभी सार्थक पहल करेगें। इसके लिए खासकर छत्तीसगढ के शोधार्थी आप सबों के ऋणी रहेंगे-ऐसा मेरा मानना है।

दादाजी की एक पंक्ति याद आ गई।  सोंचा इसका भी उल्लेख कर ही दूं-


बद दुआ देंगे हमें बाद में आने वाले,
घर न बनता न सही-‘नींव’ तो रख दी होती ?”

(लेखक/पत्रकार: लोकेश शरण)