प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित श्री विनोद कुमार शुक्ल जी का 88 साल की उम्र में निधन, शोक में युवा महोत्सव में आयोजित कुमार विश्वास का कवि सम्मेलन हुआ स्थगित

बिलासपुर। प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार, भारतीय ज्ञानपीठ से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल जी का 88 साल की उम्र में मंगलवार शाम को निधन हो गया है। एक महीने पहले ही उन्हें भारत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था। शुक्ल पिछले कुछ महीनों से बीमार चल रहे थे। उनका एम्स रायपुर में इलाज चल रहा था।

उनका निधन साहित्य जगत के लिए बहुत बड़ी क्षति है। सादगीपूर्ण लेखन और सरल व्यक्तित्व के लिए प्रसिद्ध विनोद कुमार शुक्ल जी अपनी विशिष्ट लेखन कला के लिए सदैव याद किए जाएँगे।
1 जनवरी 1937 को राजनांदगांव में जन्मे विनोद कुमार शुक्ल पिछले 50 साल से लेखन कर रहे थे। विनोद कुमार शुक्ल की पहली कविता संग्रह ‘लगभग जय हिंद’ 1971 में प्रकाशित हुई थी। उनकी कहानी संग्रह पेड़ पर कमरा और महाविद्यालय भी बहुचर्चित है।
विनोद शुक्ल के उपन्यास नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे, दीवार में एक खिड़की रहती थी हिंदी के श्रेष्ठ उपन्यासों में शुमार हैं। उनके उपन्यास ‘नौकर की कमीज’ पर जाने-माने फिल्मकार मणिकौल ने एक फिल्म भी बनाई थी।
उन्हें अपनी कविताओं, उपन्यास एवं साहित्यों के लिए कई राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। उनके निधन से साहित्य जगत को बड़ी क्षति हुई है, जिसकी भरपाई कर पाना नामुमकिन सा है।

निधन की खबर के बाद कवि सम्मेलन स्थगित
मंगलवार को शहर के पुलिस ग्राउंड में युवा महोत्सव के अंतर्गत आयोजित राष्ट्रीय कवि सम्मेलन प्रतिष्ठित साहित्यकार एवं ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल के निधन की खबर मिलने के बाद स्थगित किया गया।। कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री सहित कई वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया था। इस कवि सम्मेलन में राष्ट्रीय स्तर के ख्यातिप्राप्त कवि कुमार विश्वास विशेष रूप से काव्य-पाठ के लिए उपस्थित हुए थे।लेकिन
देश के महान साहित्यकार के निधन की सूचना मिलने के पश्चात आयोजन समिति ने कार्यक्रम को तत्काल स्थगित करने का निर्णय लिया। मंच से दिवंगत आत्मा को श्रद्धांजलि अर्पित की गई और दो मिनट का मौन रखकर उन्हें नमन किया गया। इसके पश्चात शोक स्वरूप कवि सम्मेलन को समाप्त कर दिया गया।

यह आयोजन बिलासपुर के सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण कार्यक्रम माना जा रहा था, लेकिन साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति के सम्मान में कार्यक्रम को सादगी और संवेदनशीलता के साथ विराम दिया गया।