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बिलासपुर

• अक्षर बुरे होना अपूर्ण शिक्षा की निशानी है,गांधी जी का यह कथन मुझे हमेशा प्रेरित करता रहा है : लेखक/साहित्यकार डॉ.लोकेश शरण  • स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सकरी के छात्र- छात्राओं को सिखाया सुंदर  राइटिंग लिखने की कला

बिलासपुर। ‘अक्षर बुरे होना अपूर्ण शिक्षा की निशानी है’-गांधीजी का यह कथन मुझे हमेशा प्रेरित करता रहा है। गांधीजी की लिखावट अच्छी नहीं थी। मेरे दादाजी-जो गांधीजी के साथ काफी दिनो तक साबरमती आश्रम में रह चुके थे-वे बताते थे कि गांधीजी को स्वयं अपने द्वारा लिखे गए पत्रों को कुछ दिनों के बाद पढ़ने में थोड़ी कठिनाई होती थी। उन्हें कहीं-कहीं अटकना पड़ता था……आदि-आदि।

यही कारण था कि दादाजी अक्षर सुधारने के लिए हम सबों को ‘कांड़ा’ (सरकंडा) के कलम से प्रतिदिन एक पेज लिखने को कहा करते थे। उन दिनो ‘दवात’ (INKPOT) का चलन था। पांच पैसे में इंक की टिकिया (टेबलेट) मिलती थी। दवात में पानी के साथ घोलकर इंक तैयार हो जाता था। इसी में सरकंडा की कलम को बार-बार डुबोकर लिखना होता था। यह टास्क प्रतिदिन का होता था। दादाजी स्वयं शिक्षक थे। बड़े ही अनुशासन प्रिय। क्या मजाल कि कोई छात्र इसे पूरा करके न लाए ! दवात के उपयोग का चलन समाप्त हो गया। उसका स्थान ‘बाॅलपेन’ ने लिया। अक्षरों को खराब करने में इसका सर्वाधिक योगदान है। फिर भी कक्षा-1 से 5 वीं तक पेन्सिल से लिखने के लिए यदि छात्रों को प्रोत्साहित किया जाए तो निश्चीत रुप से सार्थक परिणाम मिलेंगे। गांधीजी के मुताबिक जब तक घड़े कच्चे हैं-तभी तक उन्हें हम आसानी से जोड़ सकते हैं। खैर !

गांधीजी अपनी हैं डराइटिंग से हमेशा व्यथित रहे। इसका उल्लेख उन्होंने आगे चलकर अपनी एक कहानी में किया है जिसका शीर्षक है-‘जब मैं पढ़ता था’। इस कहानी में उन्होंने अपने छात्र जीवन के कई प्रसंगों का उल्लेख किया है। उन्हीं में से एक है अक्षरों के सुधार करने की उनकी सलाह।

उन्होंने लिखा है-‘…..जब मैं बड़ा हुआ तो दूसरों के गोल-गोल मोतियों जैसे अक्षर देखकर मुझे बड़ा पश्चाताप हुआ। काश ! मेरे भी अक्षर मोतियों के समान होते ! अक्षर बुरे होना अपूर्ण शिक्षा की निशानी है। परंतु पके घड़े पर मिट्टी चढ़ सकती है क्या ? उन्होंने अपनी इस कहानी के माध्यम  से छात्रों को प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के दौरान ही अपने अक्षरों को सुधार लेने का संदेश दिया है। गांधीजी द्वारा लिखी गई  उपरोक्त कहानी बिहार के पूर्व माध्यमिक विद्यालयों के हिन्दी के पाठ्यक्रम में शामिल है। यह अलग बात है कि हम शिक्षक उनका अनुकरण नहीं करते और न ही इस दिशा में छात्रों को ही प्रेरित कर पाते हैं। खैर !

गांधीजी का उपरोक्त कथन मेरा पीछा करता रहता है। इसका एक और बड़ा महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि अच्छी राइटिंग परीक्षक को अधिकाधिक अंक देने को विवश करती है। मेरे छोटे पुत्र अवनीश शरण (आईएएस) का दावा है कि 100 अंकों की लिखित परीक्षा में 10-12 अंक तो अच्छी राइटिंग के कारण बगैर किसी अतिरिक्त परिश्रम के छात्रों को मुफ्त में आसानी से मिल जाती है …। 

लेखन कला पर हम शिक्षक गण ध्यान नहीं दे पाते। इसके कई कारण हो सकते है। इन्हीं सब कारणों से प्रेरित होकर मुझे जहां भी मौका मिलता है मैं विद्यालयों में ज्ञान बांटने पहुंच जाता हूं ताकि छात्र-छात्राओं के सुखद सपनों को पूरा करने-कराने में मै भी अपना योगदान दे सकूं।

इसी क्रम में 13 नवंबर को स्वामी आत्मानंद शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, सकरी जाने का अवसर मिला। विद्यालय की प्राचार्य डाॅ.संध्या तिवारी ने छत्तीसगढ के परंपरागत रीति-रिवाजों से स्वागत किया। मंगलाचरण के बाद उनका संबोधन हुआ। इससे पूर्व उन्होंने विद्यालयीन पत्रिका ‘प्रवाहिका‘ की प्रति के साथ मोमेंटो भेंट की।

मैंने भी अपनी पुस्तक ‘भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में कालापानी की ऐतिहासिक’ भूमिका’-की प्रति ग्रंथालय के लिए उपहार में दी। इसके बाद मैंने चाॅक संभाला। खासबात यह भी रही कि छात्र- छात्राओं के साथ-साथ शिक्षक-शिक्षिकाओं ने भी पूरे उत्साह से राइटिंग कला को सीखा। 4.30 में प्रशिक्षण कार्य सम्पन्न होने के बाद अपने साथ ले जाए गए दो नीम के पौधों का रोपण हम सबों ने मिलकर किया।

इन सुखद स्मृतियों को कैद करने में भी किसी ने कोताही नहीं बरती। आप सब भी उनका दीदार करेंगे।
धन्यवाद।

(लेखक/साहित्यकार डॉक्टर लोकेश शरण की कलम से..)