
बिलासपुर। छत्तीसगढ के मुंगेली जिला में अवस्थित अतिप्राचीन पौराणिक स्थल ‘मदकू द्वीप’ के विषय में काफी-कुछ सुनता आ रहा था। अभी हाल ही में वहां जाने का मौका मिला। बिलासपुर से लगभग 40 किमी पर स्थित ‘मदकू द्वीप’ ‘शिवनाथ नदी’-के तट पर प्रकृति की गोद में बसा यह स्थल हरी-भरी वादियों से समृद्ध है। शिवनाथ नदी की पूर्वी धारा मुख्य धारा है जो रायपुर, बिलासपुर, बलौदाबाजार और मुंगेली जिले की सीमा का निर्धारण करती है। शिवनाथ, छत्तीसगढ की दूसरी सबसे बड़ी नदी ‘महानदी’ की प्रमुख सहायक नदी है। इसका उद्गम महाराष्ट्र के गढ़चिरौली जिले के ग्राम गोड़री तथा पानाबरस के समीप पहाड़ी से हुआ है। यह नदी दक्षिण से उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा में प्रवाहित होते हुए शिवरीनारायण के निकट महानदी में मिल जाती है। इसकी प्रमुख सहायक नदियों में तांदुला, मनियारी, लीलागर, आगर, हाॅप, सुरही खारुन, अरपा आदि शामिल हैं। इसका जल कभी सूखता नहीं है, इसलिए इसे ‘सदानीरा’ भी कहा जाता है। यह द्वीप वन विभाग का संरक्षित क्षेत्र है।

इस द्वीप के भौगोलिक स्थिती पर दृष्टिपात करें तो हम पाते है कि-मदकू द्वीप के उत्तर में बड़ियाडीह, दक्षिण में ढेलकी द्वीप, पूर्व में अकेली और परसवानी और पश्चिम में मदकू ग्राम स्थित है। इस प्राचीन स्थल से कई किंबदंतियां जुड़ी हुई हैं जो क्षेत्र के लोगों के आस्था का प्रतीक हैं।

संचनालय, संस्कृति एवं पुरातत्व, रायपुर से मिली आधिकारिक जानकारी के मुताबिक मदकू द्वीप का उत्खनन संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा वर्ष-2010-11 में कराया गया था। पुरातत्वीय सलाहकार अरुण कुमार शर्मा के मार्गदर्शन और प्रभात कुमार सिंह के निर्देशन में उत्खनन कार्य संपन्न हुए। माना जाता है कि इस स्थान के नामकरण के दो मुख्य आघार हैं। वर्तमान ‘मदकू’ शब्द वस्तुतः ‘माण्ड्क्य’ अथवा ‘मण्डूक’ का अपभ्रंश माना जाता है। डाॅ. विष्णुसिंह ठाकुर के मुताबिक यह कभी माण्डूक्य ऋषि की तपस्थली थी और संभवतः यही पर रहकर उन्होंने अपनी कृति ‘माण्डूक्योपनिषद्’ की रचना की थी। दूसरा आधार है-मण्डूक का शाब्दिक अर्थ ‘मेंढ़क’ भी होता है। माना जाता है कि शिवनाथ के जल से परिवृत इस द्वीप की आकृति जल में तैरते हुए मेंढ़क जैसी परिलक्षित होती है।

मदकू द्वीप के उत्खनन में प्रागैतिहासिक काल के लघु पाषाण उपकरण प्राप्त हुए हैं। इससे यह निष्कर्ष निकाला गया कि प्राचीन काल से ही इस द्वीप खण्ड पर मानव का निवास व संचरण होता आया है। उत्खनन में मिले दो शिलालेखों में से एक लगभग 3री शताब्दी की है जिसपर ब्राह्मी लिपि में ‘अक्षयनिधि’ का उल्लेख किया गया है। दूसरे शिलालेख ‘शंखलिपि’ के अक्षरों से सुसज्जित पाया गया। इन दोनों शिला लेखों का उल्लेख वर्ष-1959-60 के ‘इण्डियन एपिग्राफीक’ के वार्षिक प्रतिवेदन में किया गया है, परन्तु इन शिला लेखों को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के तत्कालीन दक्षिण-पूर्व मण्डल कार्यालय विशाखापट्टनम में रखा गया। आज वे कहां और किस हाल में है-इसकी जानकारी विभाग को नहीं है। राज्य सरकार को इन शिलालेखों को रायपुर स्थित म्युजियम में स्थापित करने के लिए सार्थक प्रयास करना चाहिए ताकि छत्तीसगढ के आमलोगों के साथ-साथ यहां के शोधार्थी भी इन शिलालेखों से रु ब रू होकर अपने को गौरवान्वित महसूस कर सकें।
उत्खनन में मदकू द्वीप पर प्राप्त पुरावशेषों से यह प्रमाणित हुआ है कि यह स्थल रतनपुर के कलचुरि शासकों के काल में उन्नति के शिखर पर था। इस द्वीप के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व के होने के कारण छत्तीसगढ के मध्यकालीन पुरास्थलों में इसका विशिष्ट स्थान है। लगभग 24 हेक्टेयर क्षेत्रफल में विस्तृत मदकू द्वीप के कुछ भाग पर ही उत्खनन कार्य कराये जा सकें है। 10वीं शताब्दी से 18वीं शताब्दी के मध्य लगभग 750 वर्षो तक कलचुरि राजवंश के शासकों का इस क्षेत्र पर आधिपत्य रहा। उत्खनन में मंदिरों की श्रृंखला पाई गई जिसे संधारित कर रखा गया है। यहां के नवनिर्मित मन्दिरों में सर्वाधिक ख्याति प्राप्त मन्दिर ‘राधा-कृष्ण मन्दिर’ है। इसका निर्माण वृन्दाबाई नाम की एक बाल विधवा ने 1945 में करवाया था। इसके अतिरिक्त और भी कई देवी-देवताओं के मन्दिर आकर्षण का केन्द्र हैं।
हरिहर क्षेत्र केदार द्वीप सेवा समिति के अध्यक्ष जीवनलाल कौशिक बताते हैं कि प्रतिवर्ष मकर संक्रान्ति, श्रावण मास व कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां विशाल मेला लगता है जिसमें हजारों श्रद्धालुओं का आध्यात्मिक समागम होता है। इसके अतिरिक्त सालोंभर पर्व-त्यौहारों के लिए भी यह स्थल गुलजार रहता है।

बिलासपुर-रायपुर नेशनल हाईवे के सिमगा के समीप से मदकू द्वीप जाने वाली सड़क की हालत काफी दयनीय है। मदकू द्वीप को सजाने-संवारने में राज्य सरकार द्वारा वर्षो पूर्व लाखों रुपए की लागत से कई निमार्ण कराये गए, परन्तु समुचित देखरेख व संरक्षण के अभाव में वे जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है। यहां बने ‘पार्क’ उजडते जा रहे है। शिवनाथ नदी का हरा-भरा किनारा अपने लक्ष्य से भटक रहे युवाओं का ‘ऐशगाह’ बनता दिख रहा है। पिकनिक मनाने के नाम पर अपसंस्कृति का चलन बढ़ता दिख रहा है। आवश्यकता है ‘मदकू द्वीप’ के संरक्षण की, ताकि इसके प्राचीन गौरवशाली इतिहास से हम प्रेरणा ग्रहण करते रहें।

(लेखक/साहित्यकार लोकेश शरण की कलम से..)