शिक्षक गिरफ्तार 15 साल तक फर्जी अंकसूची पर करता रहा नौकरी, कोर्ट का कड़ा फैसला — शिक्षक को सश्रम कारावास

जांजगीर-चांपा। सरकारी नौकरी पाने के लिए फर्जी दस्तावेजों का सहारा लेने वाले एक शिक्षक को आखिरकार कानून के शिकंजे ने पकड़ ही लिया। करीब 15 वर्षों तक कूट रचित अंकसूची और फर्जी खेलकूद प्रमाण पत्र के आधार पर शिक्षाकर्मी की नौकरी करने वाले आरोपी को अदालत ने दोषी ठहराते हुए सश्रम कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई है। न्यायालय के इस फैसले को सरकारी तंत्र में पारदर्शिता और ईमानदारी की दिशा में एक कड़ा संदेश माना जा रहा है। यह फैसला जांजगीर-चांपा जिले के जैजैपुर स्थित न्यायिक दंडाधिकारी प्रथम श्रेणी की अदालत में सुनाया गया। अदालत ने आरोपी चितरंजन प्रसाद कश्यप, पिता धोबीलाल, निवासी ग्राम मरघट्टी थाना हसौद, को धोखाधड़ी और जालसाजी का दोषी पाया।
257 अंकों से 405 अंक बना दी अंकसूची
प्रकरण के अनुसार, आरोपी ने वर्ष 2007 में माल्दा स्थित पीतांबर हायर सेकेंडरी स्कूल से विज्ञान संकाय में हायर सेकेंडरी परीक्षा दी थी। आधिकारिक परिणाम के मुताबिक उसे कुल 500 अंकों में से 257 अंक प्राप्त हुए थे तथा भौतिकी विषय में सप्लीमेंट्री आई थी। लेकिन जब शिक्षाकर्मी पद के लिए आवेदन करने का अवसर आया, तो आरोपी ने अपने आवेदन पत्र में 405 अंक प्राप्त होने का दावा कर दिया। जांच में सामने आया कि आरोपी द्वारा प्रस्तुत अंकसूची पूरी तरह कूट रचित थी। भौतिकी विषय में जहां उसे सप्लीमेंट्री मिली थी, वहां डिस्टिंक्शन दर्शाया गया। अन्य विषयों के अंक भी बढ़ा दिए गए थे। इतना ही नहीं, चयन में अतिरिक्त लाभ लेने के लिए खेलकूद का फर्जी प्रमाण पत्र भी संलग्न किया गया।
15 साल बाद खुला राज
करीब एक दशक से अधिक समय तक मामला दबा रहा। वर्ष 2018 में ग्राम सेमरिया थाना जैजैपुर निवासी पोथीराम कश्यप ने पुलिस अधीक्षक, जांजगीर-चांपा को लिखित शिकायत दी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि चितरंजन कश्यप ने फर्जी दस्तावेजों के जरिए नौकरी हासिल की है।
शिकायत के बाद थाना हसौद पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। स्कूल रिकॉर्ड और शैक्षणिक बोर्ड के दस्तावेजों की जांच में सच्चाई सामने आ गई। आरोपी द्वारा प्रस्तुत अंकसूची और प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए। इसके बाद वर्ष 2019 में आरोपी के खिलाफ न्यायालय में अभियोग पत्र पेश किया गया।
इन धाराओं में हुई सजा
आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 420 (धोखाधड़ी), 467 (महत्वपूर्ण दस्तावेज की जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के उद्देश्य से जालसाजी), 471 (जाली दस्तावेज का उपयोग) और 474 (जाली दस्तावेज का कब्जा) के तहत मामला दर्ज किया गया था। न्यायालय में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने दस्तावेजी साक्ष्य और गवाहों के बयान पेश किए। परीक्षण और प्रतिपरीक्षण के बाद अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराया। अदालत ने धारा 420 के तहत 2 वर्ष, धारा 467/471 के तहत 3 वर्ष, धारा 468 के तहत 1 वर्ष तथा धारा 474 के तहत 1 वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई। इसके अतिरिक्त अर्थदंड भी लगाया गया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अर्थदंड की राशि अदा न करने की स्थिति में आरोपी को अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा।
सरकारी तंत्र के लिए चेतावनी
यह फैसला उन लोगों के लिए कड़ा संदेश है जो फर्जी दस्तावेजों के सहारे सरकारी नौकरी हासिल करने की कोशिश करते हैं। अदालत ने अपने फैसले में साफ संकेत दिया कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जालसाजी को किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
करीब 15 साल तक नौकरी करने के बाद आरोपी को मिली यह सजा इस बात का उदाहरण है कि कानून से बच पाना आसान नहीं है — देर भले हो, लेकिन न्याय अवश्य होता है।