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बिलासपुरशिक्षा

डी.पी. विप्र महाविद्यालय में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजित “विकास में सबकी भागीदारी सुनिश्चित हो “- संभागायुक्त सुनील जैन



बिलासपुर। डी.पी. विप्र महाविद्यालय (स्वायत्तशासी संस्थान) में एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘विकसित भारत: संभावनाएँ एवं चुनौतियाँ समाज, राजनति और व्यापार के संदर्भ में‘ विषय पर आयोजित किया गया।

संगोष्ठी के मुख्य अतिथि सुनील कुमार जैन( संभागायुक्त),, अध्यक्षता अनुराग शुक्ला, (अध्यक्ष प्रशासन समिति),डाॅ. तारणीश गौतम, (कुलसचिव, अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय बिलासपुर), राजकुमार अग्रवाल,( वरिष्ठ सदस्य, प्रशासन समिति), डाॅ. (श्रीमती) अंजू शुक्ला, (प्राचार्य), उपप्राचार्य डाॅ. एम.एस. तम्बोली, डाॅ. नितिन तुलसीराम कत्रोजवार, (एसोसिएट प्रोफेसर, विभागाध्यक्ष रानजीति विज्ञान), राष्ट्रसंत तुकडोजी महाविद्यालय चिमूर चंद्रपुर (महाराष्ट्र), प्रो. शैलेन्द्र सिंह भदौरिया, (प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्षक वाणिज्य विभाग इंदिरा गांधी जनजातीय विश्वविद्यालय) अमरकटंक (म.प्र.), अविनाश सेठी, (अध्यक्ष एलुमिनी कमेटी) उपस्थित रहे।


संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि ने अपने उद्बोधन में बताया कि हमारे देश ने 2047 में विकसित होने का संकल्प रखा है। विकास से तात्पर्य पर्यावरण एवं हमारी सभ्यता, संस्कृति के संरक्षण के साथ मनुष्य के विकास से है। इसके साथ ही हमें अपने सामाजिक परिवेश और आगे आने वाली पीढ़ी को क्या दे सकते हैं? को समेकित करके ध्यान देना होगा। तभी हम विकास की भागीदारी सुनिश्चित कर सकते हैं। देश तभी विकसित हो सकता है। जब यह विकास देश के हर व्यक्ति का हो।

श्री अनुराग शुक्ला ने कहा कि संगोष्ठी का विषय बहुत ही समसामायिक है। इस पर विचार-विमर्श से नए-नए तथ्य हमारे सामने आते हैं। इस तरह की संगोष्ठी से निश्चित ही हम सब के चिंतन को जागृत करने में सहायक है।

श्री राजकुमार अग्रवाल ने कहा कि जब हम इतने महत्वपूर्ण व संवेदनशील विषय पर दृष्टिकोण डालते हैं कि भारत विश्व पर किस स्थान पर है तो हम पाते हैं कि भारत में विविध संस्कृति, सभ्यता और भाषा वाला क्षेत्र है। लेकिन इतनी विविधताओं के बावजूद भी इनके मूल में एक ही भाव है। जो आज के संदर्भ में पुनर्जागरण का है कि हम क्या है, कैसे है और आगे क्या कर सकते हैं। इन्हीं सब विषयों पर लेकर उन्होंने अपनी बात रखी है।

प्राचार्य डाॅ. (श्रीमती) अंजू शुक्ला ने कहा कि विकसित से तात्पर्य समाज की धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक, राजनैतिक आदि के समस्त आयामों के तार्किक विकास से है। इस संदर्भ में उन्होंने अपनी बात कही।

संगोष्ठी के संयोजक डाॅ. एम.एस. तम्बोली ने इसका उद्देश्य बताते हुए कहा कि भारत विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है, जो तेजी से विकास की ओर अग्रसर है। विकसित भारत का अर्थ केवल और सशक्त व्यापारिक ढाॅचा है। इन सभी पहलुओं को समझना अत्यंत आवश्यक है।


समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए डाॅ. ताणनीश गौतम ने कहा कि यदि हमने लक्ष्य बना लिया है तो हमें आगे बढ़ना चाहिए। भारत हमेशा से सिरमौर रहा है और हम यदि अपने लक्ष्य को केंद्र में रखकर विकासशील से विकसित हो जायें तो हम विश्वगुरू थे और आगे भी रहेंगे। यदि विकसीत भारत की परिकल्पना करना है तो समाज में हो रहे विखंडन वाद पर चिंतन करना आवश्यक है। विकास की दौड़ में आगे बढ़ना है तो समाज की ंिचंतन आवश्यक है।


तकनीकी सत्र में डाॅ. नितिन तुलशीराम कत्रोजवार ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमता और आधुनिक तकनीक का संतुलन एवं नैतिक उपयोग ही वास्तविक विकास का आधार बन सकता है। आॅनलाईन ठगी जैसे उदाहरणें को उल्लेख करते हुए उन्होंने डिजिटल साक्षरता और जागरूकता की आवश्यकता पर बल दिया। आॅनलाईन प्रणाली के अनेक लाभ हैं सुगमता, तीव्रता और पारदर्शिता परंतु इसके दुरूपयोग से हानि भी संभव है। यदि युवा अपनी ऊर्जा कौशल और नवाचार को साकारात्मक दिशा में उपयोग करें, तो भारत को विकसित राष्ट्र बनाने में कोई रोक नहीं सकता।

डाॅ. शैलेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा कि सबसे पहले हमें यह तय करना होगा कि हम विकासशील से विकसित होने में हमें कितना कार्य करना पड़ेगा इसका पैरामीटर क्या है इसे तय करना आवश्यक है । क्या यह आर्थिक स्तर पर आधारित हो, सामाजिक स्तर पर आधारित हो या राजनीतिक स्तर पर। आगे उन्होंने कहा कि हमारी अधोसंरचना तो बढ़ रही है लेकिन क्या उसका आधार सुदृ़ढ़ है। भारत को विकसित बनाना है तो हमें अपने आपको परिवर्तित करना पड़ेगा कारण कि शासन की नीतियाँ तो बहुत बन रही है लेकिन हम उसका परिपालन कितना करते है।

कार्यक्रम की संचालन डाॅ. आभा तिवारी एवं आई.क्यू.ए. सी. प्रभारी श्री ए.श्रीराम एवं आभार डाॅ. खगेन्द्र कुमार सोनी एवं डाॅ. किरण दुबे द्वारा किया गया । संगोष्ठी का प्रतिवेदन डाॅ. निधीश चैबे द्वारा दिया गया।

इस अवसर पर डाॅ. अंजू कमलेश द्वारा लिखित पुस्तक का विमोचन किया गया। डाॅ. मनीष तिवारी, डाॅ. साधना सोम, डाॅ. संजय कुमार तिवारी, डाॅ. विवेक अम्बलकर, डाॅ. आशीष शर्मा, डाॅ. तरू तिवारी, श्री शैलेन्द्र कुमार तिवारी, डाॅ. अजय यादव, डाॅ. शिखा पहारे, डाॅ. सुरुचि मिश्रा, डाॅ. विश्वास विक्टर, डाॅ. ऋचा हाण्डा, सुचित दुबे, डाॅ. मेघा दाबड़कर, यूपेश कुमार, विकास सिंह, श्री ब्रजेश बोले, श्री अरूण नथानी,सगराम चंद्रवंशी, तोरण यादव एवं महाविद्यालय के समस्त प्राध्यापक एवं छात्र-छात्राएँ उपस्थित थे।