
कोटा। कोटा के खोंगसरा रेलवे स्टेशन से महज़ 500 मीटर की दूरी पर नई रेलवे लाइन निर्माण के दौरान बिना अनुमति 2 एकड़ शासकीय भूमि क्षेत्र में 15 फीट गहरी मिट्टी की खुदाई, भारी मात्रा में मिट्टी की निकासी और कई हरे भरे विशालकाय वृक्षों का सफाए का मामला अब पूरे जिले में चर्चा का विषय बना हुआ है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह पर्यावरण संरक्षण कानूनों व खनिज नियमों की सीधी अवहेलना है। इस पर शासन प्रशासन द्वारा रेलवे ठेकेदार के विरुद्ध कड़ी कार्यवाही करने की आवश्यकता है। ताकि इस तरह आदिवासी बहुल क्षेत्र में आ कर कोई भी अवैध उत्खनन एवं पर्यावरण को नुकसान न पहुंचा सके।
खनिज विभाग की प्रेस विज्ञप्ति में सबसे ज़रूरी जानकारी ही गायब!
विभाग द्वारा जारी विज्ञप्ति में न तो फार्म/भूमि का नाम,
न पूरी पेनल्टी की राशि,न निर्माण से जुड़े पक्षों का स्पष्ट उल्लेख दिया गया। जिससे विभाग की कार्यप्रणाली पर और भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

3 दिसंबर को विभाग को जानकारी थी—फिर भी देरी!
लोगों ने पूछा—“देर क्यों? किसलिए?” सूत्रों का कहना है कि विभाग को 3 दिसंबर को ही अवैध खुदाई की जानकारी मिल गई थी,लेकिन कार्रवाई और प्रेस विज्ञप्ति कई दिन बाद जारी की गई—वह भी अधूरी जानकारी के साथ। इस देरी को लेकर लोगों ने सवाल उठाए—“जब मामला 3 दिसंबर को ही पता चल गया था तो तुरंत कार्रवाई क्यों नहीं? देरी किसलिए? किसके निर्देश पर ?
स्वयं खनिज निरीक्षक राजू यादव ने आज जानकारी देते हुए बताया कि अवैध मिट्टी की खुदाई पर रेलवे ठेकेदार झाझडिया कंपनी के खिलाफ —8.50 लाख की पेनल्टी खनिज विभाग द्वारा की गई है । लेकिन जारी प्रेस विज्ञप्ति में न पेनल्टी की राशि न फार्म का नाम का उल्लेख कही किया गया। इससे प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल और गहरे हो गए हैं।
जनता का सीधा सवाल

क्या हर मामले को High Court को ही संज्ञान में लेना होगा ?
लोगों ने कड़ा सवाल उठाया—
“सरकार सुशासन की बात करती है, लेकिन छोटी से छोटी कार्रवाई भी हाई कोर्ट के भरोसे क्यों? सरकार आदिवासी बहुल क्षेत्रों की जल,जमीन जंगल की भी सुरक्षा क्यों नहीं कर पा रही है। उन्होंने कहा कि कलेक्टर, खनिज विभाग और वन विभाग समय पर कार्रवाई क्यों नहीं कर पाए ?”

‘विभाग की चुप्पी पर तुरंत कड़ी कार्रवाई करें’
स्थानीय लोगों और जानकारों के अनुसार—“मामले में देरी, अधूरी जानकारी, और अधिकारियों की चुप्पी— यह जनता की निगाह में खनिज विभाग और वन विभाग की जिम्मेदारी पर बड़ा सवाल है। लोगों का कहना है कि कलेक्टर इस मामले को गंभीरता से लेकर तुरंत कड़ी कार्रवाई के निर्देश दें।”

यह खबर विभाग, कलेक्टर और शासन—तीनों के लिए बड़ा संकेत है कि मामले की त्वरित, निष्पक्ष और सार्वजनिक जांच अब अत्यावश्यक हो चुकी है।
